Guru Purnimaa 2023 Discourse by Gurudev Dr. Sudhin Ray

Guru Purnima 2023

Gurudev’s Speech in Bangla

English Translation of Gurudev’s Speech

Amidst this sweltering heat, your willingness to hear about Kriya Yoga is truly admirable. My Gurudev (Shri Maheshwari Prasad Dubey) often mentioned that during winter, the practice of Kriya happens seamlessly; however, in the summer, practicing Kriya presents more difficulties.

The techniques of Kriya that you’ve received, which Lahiri Baba shared with the world, can bring results if practiced consistently. Lahiri Baba also mentioned that when someone regularly practices Kriya or similar techniques, their willpower can become so strong that they can accomplish impressive things on their own.

Sometimes, I’ve had discussions with my Gurudev about whether practicing certain techniques and spiritual practices actually bring about any meaningful results for the practitioners. I’ve questioned that any outcomes depend solely on a person’s mental state, which is influenced by their three “Gunas” (qualities of nature), making it a subjective experience rather than a universal truth. This led me to think that not everyone might need to be given the specific “Kriya” technique.

In response to my doubts, Gurudev explained that the people who seek initiation into the “Kriya” practice are not ordinary individuals. Their interest in yogic practices has not developed suddenly; instead, it is rooted in a deep longing for personal growth and the liberation of their souls across multiple lifetimes. This enduring desire is what drives them to continuously seek out these techniques.

Lahiri Baba has explained how spiritual evolution or salvation can be achieved through Kriya, emphasizing the significance of Pranayama techniques. He believed that by practicing Pranayama correctly, individuals could observe changes within themselves.

Pranayama involves extended and rhythmic breathing cycles. Its purpose lies in harmonizing the divided aspects of our life force or “prana.” By birth, our prana resides in Brahmarandhra, divided into five components: pran, apan, vyan, samana, and udana. Regular Pranayama practice accumulates and unifies these divided aspects. The ultimate goal is to reach Brahmarandhra, where prana becomes stable.

Prana exists in two states: restless and stable. Restless prana gives rise to desires and thoughts, while stable prana enhances willpower and consciousness. Consistent Pranayama practice aims to attain this stable state. This state enables individuals to distinguish between restless and stable prana, leading to better self-awareness.

Lahiri Baba encourages all practitioners of Kriya to strive for this state. Once achieved, individuals experience fewer obstacles. However, the attainment of this state depends on an individual’s dedication, faith, and devotion.

We are born with a mixture of positive and negative qualities. We often find ourselves drawn to negative aspects, perhaps because we doubt the effectiveness of positive traits. Yet, if we manage to embrace these positive qualities, a cascade of positive changes can unfold.

One day, someone approached me and stated, “The practice of Kriya lacks devotion. I find greater joy in sitting before an idol, engaging in worship rituals, and performing my puja. This brings me immense happiness.”

Indeed, this happiness is understandable, as it is imbued with the power of Maya—the illusory nature of existence. Maya exerts its influence due to our transactional approach to the divine, wherein devotion is pursued for personal gain. However, a profound transformation occurs when an individual progresses along the path and establishes in Kutastha. Gradually, the practitioner begins to witness their own illuminated form, progressing to perceive a triangular shape representing the interplay of the three Gunas (modes of nature). With unwavering focus, the seeker may even glimpse Para Prakriti—the ultimate power of the divine.

Fundamentally, attaining a state of presence in Kutastha has the potential to enhance one’s willpower, but the actual outcome depends on the practitioner’s individual endeavors. Many individuals express a longing for the Grace of the Guru. In this context, ‘Grace’ signifies establishing firmly in Kutastha. Consequently, under Guru’s grace, various powers spontaneously arise within the practitioner. The term ‘Guru’ refers to the ‘Para Prana’—the vital force behind all life forces, as affirmed by the Upanishads: “Sa U Pranasya Prana,” signifying the one who embodies the very essence of life itself. Gradually, this essence starts to reveal its manifold manifestations.

Furthermore, some practitioners become so consumed by devotion through their connection to Kutastha that surrender becomes automatic.

The insights I have shared today encapsulate the essence of Kriya Yoga. Each person should introspect their current state and seek guidance from his Guru, asking, “Please enlighten me about my circumstances, the obstacles holding me back, and the path to further advancement.” Those who carry these inquiries within them will naturally discover the answers and attain a state of grace. I will conclude my words as the temperature is causing discomfort to many gathered here. If you have queries related to Kriya, feel free to meet me or call me, as my responses will be tailored to your situation. Remember, your journey is unique to you.

HIndi Translation of Gurudev’s Speech

मैं देख रहा हूँ कि किस प्रकार आप लोग इस भीषण गर्मी में भी क्रिया योग के बारे में कुछ सुनने के लिए बैठे हुए है । मेरे गुरुदेव (श्री माहेश्वरी प्रसाद दुबे) अक्सर एक अच्छी बात कहा करते थे कि “शीतकाल में क्रिया का अभ्यास अच्छा होता है, गर्मी में क्रिया का अभ्यास करना अधिक कठिन होता है”।

आपको जो ये क्रिया पद्धति मिली है, जिसको लहिड़ी बाबा ने जनमानस के साथ साझा किया है, यदि इसका नियमित रूप से अभ्यास किया जाए, तो इसके द्वारा उचित परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं। लहिड़ी बाबा ने यह भी कहा कि जब कोई व्यक्ति नियमित रूप से क्रिया या इसी तरह की पद्धतियों का अभ्यास करता है, तो उनकी इच्छाशक्ति इतनी मजबूत हो जाती है कि वे इसके द्वारा आश्चर्यजनक काम कर सकते हैं।

कभी-कभी, मैं अपने गुरुदेव के साथ क्रिया योग को लेकर चर्चा किया करता था ” कि क्या वास्तव में क्रिया योग आदि पद्धतियों के अभ्यास से किसी का कल्याण हो सकता है ?”। मेरा मानना था कि किसी व्यक्ति को साधना का परिणाम केवल उसके मानसिक स्थिति के कारण ही मिलता हैं, जिसमें उनके तीन गुणों का विशेष प्रभाव रहता है, जिससे यह साधनागत अनुभव उसके स्वयं के होते है जो सर्वसामान्य के लिए एक समान नहीं हो सकता । जिस कारण मैं उनसे पूछा करता था कि सब को क्रिया योग दीक्षा देने की आवश्यकता ही क्या है ।

इसके उत्तर में गुरुदेव ने कहा था कि जो लोग तुम्हारे पास दीक्षा के लिए आते है वो साधारण लोग नहीं है, उनकी योग साधना में रुचि अचानक नहीं आई है; बल्कि यह उनकी आत्मविकास के पथ पर अग्रसर होने और मुक्ति की गहरी इच्छा के कारण है, जो कई जन्मों की उनके खोज को परिणाम है जो उनको बार बार इस पथ पे खींच लाती है।

लहिड़ी बाबा ने कहा है कि क्रिया के माध्यम से आध्यात्मिक विकास या मुक्ति संभव है, जिसमे उन्होंने प्राणायाम तकनीकों को महत्व दिया है। उन्होंने कहा है कि प्राणायाम को सही तरीके से अभ्यास करके, व्यक्ति, स्वयं में होते हुए परिवर्तनो को देख सकता है।

प्राणायाम का अर्थ साँस-प्रश्वास को गहरा करना है । इसका उद्देश्य हमारे जीवन शक्ति या “प्राण” को स्थिर करना है। जन्म से ही हमारा प्राण ब्रह्मरंध्र में स्थित होता है, जो पांच भागों में विभाजित रहता है: प्राण, आपान, व्यान, समान और उदान। नियमित प्राणायाम के अभ्यास से इन विभाजित पञ्च प्राणो को ब्रह्मरंध्र में एकत्रित किया जाता है दूसरे शब्दों में प्राणायाम का अंतिम लक्ष्य ब्रह्मरंध्र में प्राण को स्थिर करना है ।

प्राण की दो अवस्था है : स्थिर और चंचल । चंचल प्राण के कारण इच्छाएँ और विचार उत्पन्न होते है, जबकि स्थिर प्राण इच्छाशक्ति और चेतना के प्रति सजग कराता है । नियमित प्राणायाम का उद्देश्य चंचल और स्थिर प्राण के बीच की भिन्नता को पहचानना है, जिससे हम बेहतर आत्म-जागरूकता हो सके।

लहिड़ी बाबा, सभी क्रियावानो से इस स्थिति की प्राप्ति के लिए प्रयासरत रहने के लिए कहा कहते थे । एक बार यह स्थिति प्राप्त होने पर, बाधाएँ स्वतः कम हो जाती हैं। हालांकि, इस स्थिति की प्राप्ति, व्यक्ति की समर्पणशीलता, श्रद्धा और भक्ति पर निर्भर होती है।

हम सकारात्मक और नकारात्मक गुणों के साथ जन्म लेते हैं। मानव होने के नाते, हम अक्सर नकारात्मक पहलुओं की ओर ज्यादा आकर्षित होते हैं, शायद इसलिए कि हम सकारात्मक गुणों के प्रभाव की प्रभावशालीता पर संदेह करते हैं। हालांकि, अगर हम सकारात्मक गुणों को अपनाने में सफल हो जाते हैं, तो जीवन में सकारात्मक परिवर्तनों की एक प्रक्रिया प्रारंभ हो सकती है।

एक दिन, किसी ने मेरे पास आकर कहा, “क्रियायोग में भक्ति का कोई स्थान नहीं है। मुझे तो मूर्ति के सामने बैठकर उसकी विधि पूर्वक पूजा करके ही अधिक आनंद प्राप्त होता है।”

पूजा में आनंद का अनुभव होना स्वाभाविक है, क्योंकि यह भी माया शक्ति के अंतर्गत है। माया शक्ति का प्रभाव इसलिए रहता है क्योंकि हम प्रभु से कुछ चाहने-पाने की अभिलाषा रखते है । हालांकि, जब कोई व्यक्ति निर्विकार होकर साधना मार्ग पर आगे बढ़ता है तो वह कूटस्थ में स्थिति प्राप्त करता है, थोड़ी स्थिति पक्की होने पर उसको स्वयं के सूक्ष्म शरीर के दर्शन होते है । धीरे-धीरे उसे एक त्रिकोणाकार आकृति दिखाई देती है, यही उसके तीनो गुणों की स्थिति है । अच्छी तरह से ध्यान केंद्रित करने पर साधक को आगे परा प्रकृति या योगमाया के भी दर्शन होते है ।

मूल रूप में, कूटस्थ में स्थिति पक्की होने पर व्यक्ति की इच्छाशक्ति का विकास होता है, लेकिन यह स्थिति साधक के व्यक्तिगत प्रयासों पर निर्भर करता है। कभी कोई आकर कहता है “गुरुदेव कृपा कीजिये”। यहां , ‘कृपा’ का अर्थ ‘कूटस्थ’ में स्थापित होना है। परिणामस्वरूप, गुरु की कृपा होने पर यह स्थिति आती है और साधक के भीतर स्वतः ही विभिन्न शक्तियाँ उत्पन्न होती हैं। ‘गुरु’ शब्द का अर्थ ‘परम प्राण’—जो सभी के प्राण है , जैसा कि उपनिषदों ने कहा है: “स उ प्राणस्य प्राणः ,” अर्थात जो इस चराचर जगत का प्राण है । इस स्थिति की प्राप्ति के बाद कोई संशय शेष नहीं रहता है ।

कभी-कभी ऐसा भी देखा जाता है कि किसी साधक की कूटस्थ में स्थिति होने पर वह भक्ति भाव में इतना डूब जाता है कि उसका समर्पण स्वयं ही हो जाता है ।

आज मैंने आपके साथ क्रिया योग की मूल बातें साझा किया है। प्रत्येक व्यक्ति को अपनी वर्तमान स्थिति का आत्म-मनन करना चाहिए और फिर अपने गुरु से मार्गदर्शन प्राप्त करने के लिए ऐसे प्रश्न पूछने चाहिए , “कृपया मुझे मेरी स्थिति के बारे में ज्ञान कराये, मेरे साधना में प्रगति क्यों रुक गई है, मैं और किस तरह से आगे बढूं , कृपया मुझे उचित मार्ग दिखाकर प्रेरित करें।” जो साधक इन प्रश्नो के साथ आगे बढ़ते हैं, उन्हें इनके उत्तर स्वतः प्राप्त हो जाते है और गुरु कृपा को प्राप्त करते है ।

बढ़ता हुआ तापमान सबके लिए कष्टकारक है इसीलिए मैं अपनी वाणी को अब विराम देता हूँ । यदि आपके पास क्रिया से संबंधित प्रश्न हैं, तो मुझसे आकर मिले या टेलीफोन के माध्यम से संपर्क करे , क्योंकि मेरे उत्तर आपके लिए आपकी परिस्थितियों के अनुसार होंगी, जो सर्वसामान्य के लिए नहीं है।

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